वृंदावन के बाग में गर्मियों का उत्सव
जिस समय कृष्ण द्वारका में थे, बड़े भाई बलराम वृंदावन में गोपियों के साथ ही रुके रहे। एक गर्म गर्मी की शाम गोपियों ने उन्हें यमुना किनारे घने जंगल में चांदनी के उत्सव में बुलाया। जंगली फूलों की माला पहने दाऊजी उनके साथ चंपा के पेड़ों के नीचे घेरे में नाचे। थके-थके, पर खुशी से भरे हुए, उन्होंने नदी को पुकारा — 'यमुना, यहां आ जाओ, ताकि हम जहां खड़े हैं वहीं साथ में स्नान कर सकें।'
किनारे पर गड़ा हल
यमुना का ध्यान कहीं और था, या शायद वह उनकी परीक्षा ले रही थी, उसने कोई जवाब नहीं दिया। बलराम ने फिर पुकारा। जब वह फिर भी नहीं आई, तो हलायुध — हल धारण करने वाले — सख़्त हो गए। उन्होंने अपने कंधे से अपना भारी हल उठाया और उसकी मुड़ी हुई लोहे की धार को नदी के किनारे में गाड़ दिया। फिर उन्होंने खींचा। और खुद यमुना, जो नीले पानी की साड़ी पहने कांपती हुई, गहनों से सजी नदी-देवी के रूप में सामने आई, पूरी तरह से खिंचकर उनके पैरों तक आ गई, उसकी पूरी धारा एक बड़े नए मोड़ के साथ उनकी तरफ मुड़ गई।
वह मोड़ जो आज भी है
नदी-देवी ने हाथ जोड़कर झुकते हुए माफी मांगी। 'हे सनातन प्रभु, मैंने आपको पहचाना नहीं। मुझे छोड़ दीजिए, मैं जहां चाहें वहां सेवा करूंगी।' बलराम मुस्कुराए और अपना हल हटा लिया। पर वह नया मोड़ वहीं रह गया — आज भी भक्त कहते हैं कि वृंदावन के पास यमुना का वह बड़ा मोड़ वही है जो हलायुध ने बनाया था। यह कहानी पूरे वैष्णव शास्त्र में बलराम जी की ब्रह्मांडीय सत्ता का सबसे सीधा प्रमाण है — वे केवल भगवान के बड़े भाई नहीं, बल्कि खुद आदि-शेष हैं, जिनकी बात नदियां भी सुनती हैं।
