सुनहरे फल की शर्त
कैलाश पर्वत की बर्फीली चोटी पर एक दिन नारद मुनि एक अनोखा, चमकता हुआ सुनहरा आम लेकर पहुंचे — यह था ज्ञानफल, यानी परम ज्ञान का फल। उन्होंने यह फल शिव जी और पार्वती जी को दिया और बताया कि जो भी इसे खाएगा उसे पूरा ज्ञान मिल जाएगा। गणेश और कार्तिकेय दोनों को तुरंत यह फल चाहिए था। फल को बांटा या काटा नहीं जा सकता था, तो शिव जी ने एक शर्त रखी — 'तुम दोनों में से जो पूरी दुनिया की तीन बार परिक्रमा करके सबसे पहले यहां लौटेगा, उसे यह फल मिलेगा।' यह सुनते ही फुर्तीले और तेज़ कार्तिकेय भरोसे से मुस्कुराए। वे तुरंत अपनी तेज़ सवारी, मोर पर बैठे। मोर ने ज़ोर से पंख फड़फड़ाए और आसमान में उड़ चला। कार्तिकेय बिजली की रफ़्तार से समुद्रों, महाद्वीपों, तारों और ग्रहों के ऊपर से उड़ने लगे, ठान लिया था कि पूरे ब्रह्मांड के तीन चक्कर पूरे करके ही रहेंगे।
गणेश जी की समझदारी
उधर कैलाश पर गणेश जी अपनी सवारी, छोटे से चूहे मूषक के पास खड़े थे। वे जानते थे कि उनका भारी शरीर और धीमी सवारी कभी भी अपने भाई की रफ़्तार का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। घबराने के बजाय गणेश जी चुपचाप बैठकर सोचने लगे। उनकी तेज़ बुद्धि ने जल्दी ही एक बड़ी बात समझ ली — माता-पिता ही हर चीज़ के स्रोत हैं, इसलिए पूरी दुनिया उन्हीं के भीतर समाई हुई है। गणेश जी उठे, अपने माता-पिता शिव और पार्वती के पास गए, और उनसे पास-पास बैठने को कहा। हाथ जोड़कर, पूरे आदर के साथ, गणेश जी ने उनकी तीन बार परिक्रमा की और उनके पैरों में झुककर प्रणाम किया। वे अभी परिक्रमा पूरी ही कर पाए थे कि कार्तिकेय भी लौट आए — थके हुए, पर अपनी रफ़्तार पर गर्व करते हुए। शिव जी प्यार से मुस्कुराए और बोले, 'फल गणेश ने जीता।' कार्तिकेय ने एतराज़ जताया, 'पर उसने तो दुनिया घूमी ही नहीं!' शिव जी ने समझाया, 'शास्त्रों के मुताबिक, अपने माता-पिता की भक्ति से परिक्रमा करना पूरी दुनिया की परिक्रमा के बराबर है। गणेश ने सबसे बड़ी समझदारी दिखाई है।' कार्तिकेय ने खुशी-खुशी हार मान ली, और गणेश जी ने खुशी-खुशी ज्ञानफल खाया — यह साबित करते हुए कि भीतर की समझ हमेशा बाहर की रफ़्तार से बड़ी होती है।
