अर्जुन का टूटना, और कृष्ण की शरण
युद्ध के शंख बजे, और कुरुक्षेत्र की धूल आसमान तक उठी। दो बड़ी-बड़ी सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं — भाई-भाई के खिलाफ, गुरु शिष्य के खिलाफ। अपने शानदार सुनहरे रथ पर खड़े अर्जुन ने सामने वाली सेना को देखा, और अचानक एक गहरे दुख ने उन्हें जकड़ लिया। उनके हाथ कांपने लगे और धनुष गांडीव उनके हाथों से छूट गया। 'हे कृष्ण,' अर्जुन रोते हुए बोले, उनकी आवाज़ कांप रही थी, 'मैं लड़ नहीं सकता। अपने ही लोगों का खून बहाकर मिला राज्य किस काम का? मैं अपने हथियार रख देता हूं।' वे रथ में बैठ गए, पूरी तरह टूटे हुए। भगवान कृष्ण, जो उनके सारथी बने थे, शांत, प्यार भरी मुस्कान के साथ मुड़े। 'हे अर्जुन, इस मुश्किल घड़ी में यह उदासी कहां से आई? समझदार लोग न जीवितों के लिए दुखी होते हैं, न मरे हुओं के लिए। आत्मा तो अमर है; उसे न कोई हथियार काट सकता है, न आग जला सकती है, न हवा सुखा सकती है। तुम एक योद्धा हो; बिना फल की चिंता किए अपना धर्म निभाओ, और अपने हर काम को उस परमात्मा को सौंप दो।'
दिव्य आंखों का तोहफ़ा
अर्जुन ने सब सुना, उनके मन में बात बैठने लगी, पर उनका दिल फिर भी कोई सबूत मांग रहा था। 'हे कृष्ण, तुम कहते हो कि तुम ही सब कुछ के स्रोत हो। अगर हो सके, तो मुझे अपना अविनाशी, विराट रूप दिखा दो।' कृष्ण बोले, 'तुम अपनी इंसानी आंखों से मेरी अनंत महिमा नहीं देख सकते, अर्जुन। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूं — एक ऐसी दृष्टि जिससे तुम यह देख पाओगे।' उसी पल युद्धक्षेत्र की सारी सीमाएं मिट गईं। अर्जुन की नज़र तीन दिशाओं से भी आगे बढ़ गई। हवा गर्म हो गई, और एक हल्की, लयबद्ध गूंज — मानो 'ॐ' की ध्वनि हो — धरती में कंपन करने लगी। अर्जुन की सांस थम गई, जब उनके दोस्त कृष्ण का जाना-पहचाना रूप बड़ा होने लगा, और उससे एक ऐसी चमक निकलने लगी जो आसमान को निगलने लगी।
अनंत ब्रह्मांड, और समय के स्वामी
अर्जुन ने विश्वरूप देखा — वह विराट रूप। यह इतना भव्य नज़ारा था मानो एक साथ हज़ार सूरज आसमान में फूट पड़े हों। कृष्ण के अनंत मुंह, अनंत आंखें, अनंत चेहरे थे, जो चारों दिशाओं में फैले हुए थे। वे स्वर्ग की मालाओं से सजे थे और उनके हाथों में अनगिनत चमकते हथियार थे। उस विशाल शरीर के भीतर अर्जुन ने पूरी सृष्टि देखी — ब्रह्मा, शिव और इंद्र अपने-अपने सिंहासन पर बैठे; तारे, आकाशगंगाएं और ग्रह अपनी जगह घूमते हुए; नदियां, समुद्र और पहाड़ उनकी त्वचा पर टिके हुए। पर यह दृश्य डरावना भी था। अर्जुन ने देखा कि दोनों सेनाओं के योद्धा पतंगों की तरह कृष्ण के धधकते मुंह में दौड़े चले जा रहे थे। 'तुम कौन हो, यह भयानक रूप?' अर्जुन कांपते हुए चीखे। उस ब्रह्मांडीय रूप ने एक ऐसी आवाज़ में जवाब दिया जो पूरे आकाश में गूंज गई — 'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो — मैं काल हूं, संसार का नाश करने वाला, यहां सबको समेटने आया हूं। तुम्हारे लड़े बिना भी ये योद्धा जीवित नहीं रहेंगे। उठो अर्जुन, लड़ो और यश पाओ, क्योंकि ये पहले ही मेरे हाथों मारे जा चुके हैं। बस मेरा एक ज़रिया बन जाओ।' गहरे विनम्र भाव से झुककर अर्जुन ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपने पहचाने-से दोस्ताना रूप में लौट आएं।
