कुशस्थली का सबसे गौरवान्वित पिता
रात के वक़्त, राजा ककुद्मी समंदर किनारे बने अपने महल की छत पर बेचैनी से टहल रहे थे। ऐसी बेचैनी, जो उन्हें आज तक किसी दुश्मन ने नहीं दी थी। उनकी बेटी रेवती हर उस कला में पारंगत थी जो एक राजकुमारी को आनी चाहिए। जो भी राजा उसका हाथ मांगने आता, वो उसके पिता की नज़रों में सूरज के सामने एक टिमटिमाती मोमबत्ती जैसा ही लगता। उन्होंने देश के सबसे बड़े और नामचीन लोगों की एक फेहरिस्त बनाई और फिर एक-एक करके हर नाम काटते चले गए।
"सिर्फ एक ही है जिसे इसका जवाब पता होगा," आख़िरकार उन्होंने कहा। "सृष्टि के पितामह।"
ऊपर की राह
पिता और पुत्री नश्वर दुनिया को पीछे छोड़ते हुए ऊपर उठे। देवताओं की सभाओं को पार करते हुए, उनका सफ़र ब्रह्मलोक की ओर था—वो सर्वोच्च लोक, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहाँ वक़्त की चाल भी अलग होती है। रेवती ने पूछा कि इस चढ़ाई में कितना वक़्त लगेगा।
उसके पिता हँस पड़े। "एक पिता जब अपनी बेटी के काम से निकला हो, तो उसके लिए वक़्त के क्या मायने?"
संगीत सभा
ब्रह्मा के दरबार में गंधर्वों—स्वर्ग के संगीतकारों—का गायन पहले से चल रहा था। चार मुखों वाले देवता पूरी तरह मंत्रमुग्ध बैठे थे; उस दरबार में कोई उन्हें टोकने का सपना भी नहीं देख सकता था। ककुद्मी और रेवती चौखट पर ही रुक कर इंतज़ार करने लगे। वो संगीत पृथ्वी पर बजने वाले किसी भी वाद्य से मेल नहीं खाता था—उसके हर सुर में जैसे युगों-युगों का समय समाया था, और उसका उतार-चढ़ाव ऐसा था जैसे कोई वाद्य नहीं, बल्कि कोई जीव सांस ले रहा हो।
जब संगीत का आख़िरी सुर धीरे-धीरे ख़ामोश हुआ, तो ककुद्मी आगे आए, झुककर प्रणाम किया, और बहुत सहेज कर रखी गई सुयोग्य वरों की अपनी सूची पढ़नी शुरू की।
ब्रह्मा की हँसी
ब्रह्मा की ज़ोरदार हँसी से पूरा दरबार गूंज उठा। "राजन," उन्होंने कहा, "इस सूची का हर आदमी जा चुका है। उनके बेटे भी जा चुके हैं। आज ज़िंदा बचे लोगों को उनके पोतों के नाम तक याद नहीं। तुम यहाँ खड़े होकर बस एक गाने के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे, और इस बीच पृथ्वी पर चारों युगों के सत्ताईस चक्र बीत चुके हैं।"
ककुद्मी सुन्न रह गए। नामों की वो सूची अब भी उनके हाथ में खुली हुई थी। फिर ब्रह्मा के चेहरे पर थोड़ी नरमी आई। "मगर इस वक़्त पृथ्वी पर एक ऐसा व्यक्ति है जो इसके लायक है—हलधर बलराम, जिसके भीतर सारी दुनिया की ताक़त बसती है। तुम इसे उसी के पास ले जाओ।"
एक सिकुड़ती दुनिया
वे दोनों वापस उसी पृथ्वी पर उतरे, जिसे अब वे पहचान भी नहीं पा रहे थे। शहर ज़्यादा स्वार्थी हो गए थे, लोग कद में छोटे और बात-बात पर भड़कने वाले। उनकी गैरहाज़िरी में एक पूरा युग बदल चुका था। रेवती, जिसका कद उस बीते युग की रानियों की तरह ही ऊँचा था, बलराम को सौंप दी गई। बलराम ने अपने हल की नोक से उसे धीरे से छुआ, और उसका कद उस दुनिया के हिसाब का हो गया जिसमें उसे अब जीना था।
अपना ये लंबा काम आख़िरकार पूरा करने के बाद, ककुद्मी जंगल की ओर लौट गए। वो वहाँ अकेले बैठकर बस उसी एक बात पर मनन करना चाहते थे जो इस सफ़र ने उन्हें सिखाई थी: वक़्त इंसान की हर योजना को मिटा देता है, सिवाय उस योजना के, जो खुद ईश्वर की मर्जी से मेल खाती हो।
