An encyclopedia of Sanātana Dharma
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टूटे खंभे से निकले नर-सिंह

नृसिंह अवतार

विष्णु जी ने अत्याचारी हिरण्यकशिपु के नामुमकिन वरदान की हर शर्त पूरी करते हुए, आधे इंसान आधे शेर, नृसिंह के रूप में प्रकट होकर उसे मारा — सांझ के वक्त, दहलीज़ पर, अपनी जांघों पर, हथियार की जगह अपने नाखूनों से। और छोटे भक्त प्रह्लाद इस पूरे समय बिना डरे खड़े रहे।

नामुमकिन वरदान

मारे गए हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु बदला लेने के लिए अजेय बनने की कसम खा बैठा। उसने इतनी कड़ी तपस्या की कि खुद ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसे एक वरदान दिया — 'तुम्हारी मृत्यु न दिन में होगी न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न ज़मीन पर न आकाश में, न किसी इंसान से न किसी जानवर से, न किसी बने हुए हथियार से।' खुद को अब अमर मानकर उस राजा ने तीनों लोकों में विष्णु की पूजा पर पाबंदी लगा दी। पर उसके अपने ही महल में उसका छोटा बेटा प्रह्लाद यह मानने को तैयार नहीं था। हर सुबह बालक 'नारायण' का नाम जपता। हर दिन पिता का दिल और सख़्त होता जाता।

प्रह्लाद की परीक्षा

हिरण्यकशिपु ने हर तरह की यातना आज़माई: आग प्रह्लाद को जला न सकी, सांप उसे काटने से मुकर गए, हाथी उसे कुचल न पाए, ज़हर उसके प्याले में अमृत बन गया, समुद्र ने उसे वापस किनारे पर फेंक दिया। हर बार बालक बिना किसी चोट के लौट आता, शांति से नारायण का नाम जपते हुए। आखिरकार राजा फट पड़ा। 'कहां है तेरा यह विष्णु?' वह चिल्लाया। 'क्या वह इस खंभे में है?' 'हां,' बालक ने कहा, 'वे यहीं हैं।' और राजा ने पूरे गुस्से से खंभे पर वार कर दिया।

दहलीज़ पर सांझ

खंभा एक गरजती रोशनी के साथ फट पड़ा। उसके भीतर से नृसिंह प्रकट हुए — शेर का चेहरा, इंसान का शरीर, तूफान जैसे बाल, जलते सूरज जैसी आंखें, मुड़ी हुई तलवारों जैसे नाखून। उन्होंने अत्याचारी को कमर से पकड़ लिया। यह न दिन था न रात — यह ठीक सांझ का वह क्षण था। वे राजा को उस बड़े हॉल की दहलीज़ पर ले गए — न घर के अंदर, न बाहर। उन्होंने उसे अपनी जांघों पर लिटा दिया — न ज़मीन पर, न आकाश में। उन्होंने अपने नाखूनों से राक्षस की छाती चीर डाली — न हथियार से, न खाली हाथ से, न इंसान ने, न जानवर ने। नामुमकिन वरदान की हर शर्त पूरी हुई; अधर्म का हर कतरा मिट गया। फिर, अभी भी गुस्से से भरे नृसिंह ने देखा कि छोटा बालक प्रह्लाद बिना डरे उनके पास आ रहा है। बालक ने स्तुति गाई, और धीरे-धीरे शेर वाला चेहरा नारायण के कोमल रूप में बदल गया। उन्होंने अपना हाथ प्रह्लाद के सिर पर रखा और उसे अटूट भक्ति का आशीर्वाद दिया।