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जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मथा

समुद्र मंथन

देवताओं और असुरों की एक बहुत पुरानी कहानी, जब दोनों ने मिलकर समुद्र मथा और उसमें से अमृत — यानी अमरता का रस — के साथ-साथ कई और अनमोल चीज़ें भी निकालीं।

देवता कमज़ोर पड़ गए

स्वर्ग पर मुसीबत के बादल छा गए थे। देवताओं के राजा इंद्र ने गुस्से वाले ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया, और ऋषि ने गुस्से में आकर देवताओं को शाप दे दिया — कि उनकी सारी ताकत और चमक खत्म हो जाएगी। असुरों को जैसे ही यह पता चला, उन्होंने मौका देखकर स्वर्ग पर धावा बोल दिया और उस पर कब्ज़ा कर लिया। घबराए हुए देवता क्षीरसागर पहुंचे और भगवान विष्णु से मदद माँगी। विष्णु की आवाज़ गरजते बादल जैसी गूंजी — 'देवताओ, डरो मत। तुम्हें अपने पुराने दुश्मन असुरों से थोड़ी देर के लिए दोस्ती करनी होगी। तुम दोनों मिलकर ही समुद्र मंथन कर पाओगे, और उसी से अमृत निकलेगा — वह अमृत जो अमर बना देता है। जाओ, उन्हें बराबर हिस्सा देने का वादा करो, बाकी मुझ पर छोड़ दो।' इंद्र को यह पसंद तो नहीं आया, फिर भी वह असुरों के राजा बलि के पास गया और यह बात कही। अमरता के लालच में असुर मान गए। दोनों मिलकर समुद्र किनारे पहुंचे, मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया, और नागराज वासुकि से कहा कि वह पर्वत के चारों ओर लिपटकर रस्सी का काम करे।

पर्वत डूबने लगा, कूर्म अवतार आए

मंथन शुरू हुआ, लेकिन मंदराचल पर्वत इतना भारी था कि पानी उसे संभाल नहीं पाया। पहाड़ धीरे-धीरे समुद्र की तली में धँसने लगा, और लगा जैसे सबकी उम्मीदें भी उसी के साथ डूब जाएंगी। तभी भगवान विष्णु ने कछुए का रूप लिया — कूर्म अवतार, एक विशाल कछुआ जिसका खोल सोने जैसा चमक रहा था। वे पानी के अंदर गए और अपनी पीठ पर्वत के नीचे लगा दी, जिससे पर्वत को एक मज़बूत सहारा मिल गया। मंथन फिर से पूरे ज़ोर से शुरू हो गया। देवता वासुकि की पूंछ पकड़कर खींच रहे थे, जबकि असुर घमंड में आकर सिर वाला हिस्सा पकड़ बैठे, बिना यह सोचे कि नाग के मुंह से आग जैसी साँस निकल रही थी।

हलाहल का ज़हर

अचानक समुद्र में उबाल आने लगा — पर अमृत की जगह एक डरावना, गहरे बैंगनी रंग का धुआं उठने लगा। यह था हलाहल, इतना खतरनाक ज़हर कि पूरी दुनिया को पल भर में जला सकता था। 'हमें बचाओ, महादेव!' देवता और असुर दोनों घबराकर चीखने लगे और उस ज़हरीले धुएं से दूर भागने लगे। कैलाश पर्वत के योगी भगवान शिव शांति से आगे बढ़े। 'दुनिया को खत्म नहीं होने दिया जा सकता,' उन्होंने धीरे से कहा। उन्होंने अपने हाथों में सारा ज़हर समेटा और पी लिया। यह देखते ही देवी पार्वती ने तुरंत शिव का गला दबा दिया, ताकि ज़हर वहीं रुक जाए, नीचे न जाए। ज़हर की वजह से उनका गला गहरे नीले रंग का हो गया, और तभी से उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा।

समुद्र से निकले खज़ाने, और देवी लक्ष्मी

शिव के इस बलिदान से खतरा टल गया, और मंथन फिर से पूरी ताकत से चलने लगा। अब समुद्र अपने छुपे हुए खज़ाने बाहर निकालने लगा। सबसे पहले निकली सुरभि — वह गाय, जो माँगने पर कुछ भी दे देती है। फिर आया उच्चैश्रवा, सात सिरों वाला शानदार सफेद घोड़ा, और ऐरावत, कई दांतों वाला विशाल सफेद हाथी। इसके बाद चमकता हुआ कौस्तुभ मणि निकला, और पारिजात का पेड़, जिसकी खुशबू से हवा महक उठी। अचानक लहरें दो हिस्सों में बंट गईं और चारों तरफ सुनहरी रोशनी फैल गई। एक पूरी तरह खिले हुए गुलाबी कमल पर बैठी देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। उनकी सुंदरता देखकर सब देखते ही रह गए। उनके हाथों से सोने के चमकते सिक्के समुद्र में बरसने लगे, मानो समृद्धि खुद बरस रही हो। स्वर्ग के गायक उनकी तारीफ में गाने लगे, हाथियों ने पवित्र जल से उन्हें नहलाया। लक्ष्मी ने वहां खड़े देवताओं, राजाओं और असुरों को देखा — अपने सच्चे साथी को ढूंढते हुए। घमंडी असुरों और घबराए देवताओं को छोड़कर, उनकी नज़र आख़िर भगवान विष्णु पर टिकी। वे धीरे-धीरे चलकर उनके पास गईं और खुशबूदार कमल के फूलों की माला उनके गले में डाल दी — यानी विष्णु को अपना हमेशा का साथी चुन लिया। इस तरह विष्णु और लक्ष्मी हमेशा के लिए साथ हो गए।

धन्वंतरि और मोहिनी की चतुराई

समुद्र की आख़िरी लहर से धन्वंतरि प्रकट हुए, विष्णु के वैद्य अवतार, हाथ में सुनहरा कलश लिए जिसमें वह अमृत था जिसका सब इंतज़ार कर रहे थे। बेसब्र असुरों ने वादा तोड़ते हुए कलश छीन लिया और खुशी से चिल्लाते हुए भाग गए, ताकि पहले वही उसे पी सकें। देवता निराश होकर चिल्लाने लगे, चारों तरफ हलचल मच गई। तब विष्णु एक बेहद सुंदर स्त्री का रूप लेकर मोहिनी बन गए। उनकी चाल किसी नाच जैसी थी, और उनकी मुस्कान पर असुर फ़िदा हो गए। उनके सामने असुरों ने खुद ही कलश उन्हें सौंप दिया और कहा कि वही अमृत बांट दें। मोहिनी मुस्कुराईं और देवताओं तथा असुरों को अलग-अलग कतारों में बिठा दिया। फिर बड़ी नज़ाकत से उन्होंने पहले देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया। एक असुर, राहु, देवता का भेष बनाकर उनकी कतार में बैठ गया और एक बूंद पी भी ली। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और मोहिनी को इशारा किया। तुरंत विष्णु का सुदर्शन चक्र चमका और उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। चूंकि अमृत उसके गले तक पहुंच चुका था, उसका सिर (राहु) और धड़ (केतु) दोनों अमर हो गए। देवताओं को सुरक्षित अमृत पिलाकर और उन्हें अमरता देकर मोहिनी अचानक गायब हो गईं, और असुरों को समझ आया कि उनके साथ धोखा हुआ है। नई ताकत पाकर देवताओं ने असुरों को आसानी से हरा दिया, और स्वर्ग में फिर से शांति लौट आई।