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Śrīrāmacaritamānas · Kāṇḍa 2 of 7

Ayodhyā KāṇḍaThe book of Ayodhyā

अयोध्या काण्ड

The interrupted coronation, Kaikeyī's two boons, fourteen years of exile, Bharata's renunciation and the sandals kept upon the throne.

Verse by verse

664 blocks
  1. Śloka

    2.1

    यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

    भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

    सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा

    शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्।।1।।

    प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।

    मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।।

    नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।

    पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।।

  2. Dohā / Sorṭhā

    2.2

    श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।

    बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।

  3. Caupāī

    2.3

    जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

    भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।

    रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।

    मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।

    कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।

    सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।

    मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।

    राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।

  4. Dohā / Sorṭhā

    2.4

    सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।

    आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।

  5. Caupāī

    2.5

    एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।

    सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।

    नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।

    तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।

    मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।

    रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।

    श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।

    नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।

  6. Dohā / Sorṭhā

    2.6

    यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।

    प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।

  7. Caupāī

    2.7

    कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

    सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।

    सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।

    बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।

    जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।

    मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।

    अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।

    मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।

  8. Dohā / Sorṭhā

    2.8

    राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।

    फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।

  9. Caupāī

    2.9

    सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।

    नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।

    मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।

    प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।

    पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।

    सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।

    सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।

    भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।

  10. Dohā / Sorṭhā

    2.10

    बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।

    सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।

  11. Caupāī

    2.11

    मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।

    कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।

    जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।

    मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।

    बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।

    जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।

    नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।

  12. Dohā / Sorṭhā

    2.12

    कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।

    राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।

  13. Caupāī

    2.13

    हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।

    औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।

    चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।

    मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।

    बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।

    सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।

    रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।

    पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।

  14. Dohā / Sorṭhā

    2.14

    ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।

    सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।

  15. Caupāī

    2.15

    जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।

    बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।

    सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।

    राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।

    पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।

    भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।

    भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।

    रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।

  16. Dohā / Sorṭhā

    2.16

    एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।

    सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।

  17. Caupāī

    2.17

    प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।

    प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।

    चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।

    आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।

    पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।

    जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।

    गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।

  18. Dohā / Sorṭhā

    2.18

    राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।

    लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।

  19. Caupāī

    2.19

    तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।

    गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।

    सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।

    गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।

    सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।

    तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।

    प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।

    आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।

  20. Dohā / Sorṭhā

    2.20

    सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।

    राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।

  21. Caupāī

    2.21

    बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

    भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।

    राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।

    गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।

    जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।

    करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।

    बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।

    प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।

  22. Dohā / Sorṭhā

    2.22

    तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।

    सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।

  23. Caupāī

    2.23

    बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

    भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।

    हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।

    कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।

    कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।

    सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।

    तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।

    सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।

  24. Dohā / Sorṭhā

    2.24

    बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।

    रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।

  25. Caupāī

    2.25

    सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

    देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।

    बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।

    जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।

    बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।

    ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।

    आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।

    हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।

  26. Dohā / Sorṭhā

    2.26

    नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।

    अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।

  27. Caupāī

    2.27

    दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।

    पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।

    करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।

    देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।

    भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।

    ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।

    हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।

    तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।

  28. Dohā / Sorṭhā

    2.28

    सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।

    लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।

  29. Caupāī

    2.29

    कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।

    रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।

    भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।

    देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।

    पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।

    नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।

    सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।

    पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।

  30. Dohā / Sorṭhā

    2.30

    काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।

    तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।

  31. Caupāī

    2.31

    प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

    सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।

    जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।

    राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।

    कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।

    मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।

    जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।

    प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।

  32. Dohā / Sorṭhā

    2.32

    भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।

    हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।

  33. Caupāī

    2.33

    एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

    फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।

    कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।

    हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।

    करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।

    कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।

    जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।

    तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।

  34. Dohā / Sorṭhā

    2.34

    गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।

    सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।

  35. Caupāī

    2.35

    सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।

    तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।

    तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।

    सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।

    प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।

    रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।

    भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।

    जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।

  36. Dohā / Sorṭhā

    2.36

    तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।

    मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।

  37. Caupāī

    2.37

    चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

    पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।

    सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।

    सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।

    राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।

    रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।

    यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।

    आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।

  38. Dohā / Sorṭhā

    2.38

    रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।

    कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।

  39. Caupāī

    2.39

    भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

    का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।

    भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।

    खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।

    जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।

    रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।

    रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।

    जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।

  40. Dohā / Sorṭhā

    2.40

    कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।

    भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।

  41. Caupāī

    2.41

    कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।

    तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।

    कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।

    फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।

    सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।

    दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।

    काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।

  42. Dohā / Sorṭhā

    2.42

    अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।

    केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।

  43. Caupāī

    2.43

    नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।

    अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।

    दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।

    अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।

    जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।

    जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।

    पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।

    भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।

  44. Dohā / Sorṭhā

    2.44

    परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।

    कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।

  45. Caupāī

    2.45

    कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।

    लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।

    सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।

    कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।

    दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।

    सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।

    भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।

    होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।

  46. Dohā / Sorṭhā

    2.46

    बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।

    काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।

  47. Caupāī

    2.47

    कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।

    तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।

    जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।

    बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।

    बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।

    पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।

    कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।

    राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।

  48. Dohā / Sorṭhā

    2.48

    प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।

    एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।

  49. Caupāī

    2.49

    बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।

    प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।

    फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।

    को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।

    जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।

    सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।

    अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।

    को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।

  50. Dohā / Sorṭhā

    2.50

    साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।

    गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।

  51. Caupāī

    2.51

    कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।

    सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।

    सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।

    सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।

    सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।

    भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।

    कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।

    जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।

  52. Chanda

    2.52

    केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।

    मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई।।

    दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।

    तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।।

  53. Dohā / Sorṭhā

    2.53

    बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि।

    कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।।25।।

  54. Caupāī

    2.54

    अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।

    कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।

    सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।

    जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।

    प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।

    जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।

    बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।

    घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।

  55. Dohā / Sorṭhā

    2.55

    यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।

    भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।

  56. Caupāī

    2.56

    पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।

    भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।

    रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।

    दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।

    ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।

    लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।

    जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।

    कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।

  57. Dohā / Sorṭhā

    2.57

    मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।

    देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।

  58. Caupāī

    2.58

    जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।

    थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।

    झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।

    रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।

    नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।

    सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।

    तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।

    बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।

  59. Dohā / Sorṭhā

    2.59

    भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।

    भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।

  60. Caupāī

    2.60

    सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।

    मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।

    तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।

    सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।

    गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।

    बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।

    माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।

    मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।

    अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।

  61. Dohā / Sorṭhā

    2.61

    कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।

    जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।

  62. Caupāī

    2.62

    एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

    भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।

    जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।

    देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।

    देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।

    सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।

    सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।

    अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।

  63. Dohā / Sorṭhā

    2.63

    धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।

    सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।

  64. Caupāī

    2.64

    आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

    मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।

    लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।

    बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।

    प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।

    मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।

    अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।

    सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

  65. Dohā / Sorṭhā

    2.65

    लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।

    मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।

  66. Caupāī

    2.66

    राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

    मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।

    रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।

    एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।

    अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।

    कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।

    तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।

    जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

  67. Dohā / Sorṭhā

    2.67

    प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।

    जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।

  68. Caupāī

    2.68

    जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

    कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।

    समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।

    सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।

    कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।

    देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।

    रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।

    जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

  69. Dohā / Sorṭhā

    2.69

    होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।

    मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।

  70. Caupāī

    2.70

    अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

    पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।

    दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।

    ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।

    लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।

    गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।

    मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।

    राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

  71. Dohā / Sorṭhā

    2.71

    देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।

    कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।

  72. Caupāī

    2.72

    ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

    कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।

    पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।

    जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।

    दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।

    दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।

    छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।

    तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

  73. Dohā / Sorṭhā

    2.73

    मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।

    लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।

  74. Caupāī

    2.74

    चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

    सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।

    सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।

    करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।

    तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।

    अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।

    जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।

    फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।

  75. Dohā / Sorṭhā

    2.75

    परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।

    कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।

  76. Caupāī

    2.76

    राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

    हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।

    उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।

    भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।

    बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।

    पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।

    मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।

    तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।

  77. Dohā / Sorṭhā

    2.77

    द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।

    जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।

  78. Caupāī

    2.78

    पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

    जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।

    गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।

    धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।

    पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।

    कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।

    सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।

    सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

  79. Dohā / Sorṭhā

    2.79

    परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।

    रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।

  80. Caupāī

    2.80

    आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।

    चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।

    सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।

    उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।

    समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।

    रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।

    निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।

    रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

  81. Dohā / Sorṭhā

    2.81

    जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।

    सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।

  82. Caupāī

    2.82

    सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।

    सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।

    करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।

    तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।

    मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।

    सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।

    देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।

    सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।

  83. Dohā / Sorṭhā

    2.83

    सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।

    सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।

  84. Caupāī

    2.84

    निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।

    जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।

    जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।

    सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।

    मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।

    बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।

    सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।

    तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।

  85. Dohā / Sorṭhā

    2.85

    मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।

    तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।

  86. Caupāī

    2.86

    भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।

    जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।

    सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।

    तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।

    अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।

    थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।

    राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।

    जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।

  87. Dohā / Sorṭhā

    2.87

    सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।

    चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।

  88. Caupāī

    2.88

    रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।

    सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।

    तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।

    राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।

    पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।

    तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।

    लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।

    रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।

  89. Dohā / Sorṭhā

    2.89

    गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।

    सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।

  90. Caupāī

    2.90

    अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।

    सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।

    लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।

    रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।

    सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।

    बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।

    सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।

    आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।

  91. Dohā / Sorṭhā

    2.91

    तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।

    बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।

  92. Caupāī

    2.92

    अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।

    सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।

    अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।

    रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।

    देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।

    तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।

    अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।

    देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।

  93. Dohā / Sorṭhā

    2.93

    मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।

    आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।

  94. Caupāī

    2.94

    धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।

    चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।

    आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।

    बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।

    अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।

    नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।

    सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।

    जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।

  95. Dohā / Sorṭhā

    2.95

    मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।

    मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।

  96. Caupāī

    2.96

    मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।

    एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।

    निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।

    कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।

    पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।

    सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।

    सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।

    निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।

  97. Dohā / Sorṭhā

    2.97

    काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।

    का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।

  98. Caupāī

    2.98

    का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।

    एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।

    जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।

    एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।

    सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।

    एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।

    कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।

    सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।

  99. Dohā / Sorṭhā

    2.99

    चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।

    सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।

  100. Caupāī

    2.100

    एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।

    खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।

    बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।

    लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।

    भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।

    करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।

    कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।

    कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।

  101. Dohā / Sorṭhā

    2.101

    सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।

    राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।

  102. Caupāī

    2.102

    अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।

    भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।

    नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।

    गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।

    जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।

    जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।

    राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।

    उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।

  103. Chanda

    2.103

    जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।

    हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही।।

    जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।

    तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी।।

  104. Dohā / Sorṭhā

    2.104

    सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।

    तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।50।।

  105. Caupāī

    2.105

    उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।

    ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।

    राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।

    एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।

    जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।

    बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।

    अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।

    मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।

  106. Dohā / Sorṭhā

    2.106

    नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।

    छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।

  107. Caupāī

    2.107

    रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।

    दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।

    बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।

    गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।

    प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।

    सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।

    कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।

    सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।

  108. Dohā / Sorṭhā

    2.108

    जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।

    जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।

  109. Caupāī

    2.109

    तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।

    पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।

    मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।

    सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।

    धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।

    पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।

    आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।

    जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।

  110. Dohā / Sorṭhā

    2.110

    बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।

    आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।

  111. Caupāī

    2.111

    बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।

    सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।

    कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।

    नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।

    धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।

    तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।

    राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।

    तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।

  112. Dohā / Sorṭhā

    2.112

    निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।

    सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।

  113. Caupāī

    2.113

    राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।

    लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।

    धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।

    राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।

    कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।

    बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।

    सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।

    तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।

  114. Dohā / Sorṭhā

    2.114

    राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।

    तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।

  115. Caupāī

    2.115

    जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

    जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।

    पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।

    अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।

    बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।

    जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।

    पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।

    ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।

  116. Dohā / Sorṭhā

    2.116

    यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।

    मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।

  117. Caupāī

    2.117

    देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।

    अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।

    अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।

    जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।

    सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।

    बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।

    दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।

    राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।

  118. Dohā / Sorṭhā

    2.118

    समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।

    जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।

  119. Caupāī

    2.119

    दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।

    बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।

    चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।

    की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।

    चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।

    मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।

    मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।

    तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।

  120. Dohā / Sorṭhā

    2.120

    पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।

    पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।

  121. Caupāī

    2.121

    मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।

    नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।

    कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।

    फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।

    पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।

    जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।

    सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।

    चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।

  122. Dohā / Sorṭhā

    2.122

    करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।

    बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।

  123. Caupāī

    2.123

    बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।

    पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।

    कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।

    सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।

    सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।

    अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।

    जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।

    सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।

  124. Dohā / Sorṭhā

    2.124

    कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।

    लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।

  125. Caupāī

    2.125

    मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।

    राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।

    आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।

    आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।

    एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।

    जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।

    तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।

    कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।

  126. Dohā / Sorṭhā

    2.126

    गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।

    हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।

  127. Caupāī

    2.127

    मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।

    दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।

    जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।

    काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।

    कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।

    चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।

    कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।

    भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।

  128. Dohā / Sorṭhā

    2.128

    भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।

    ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।

  129. Caupāī

    2.129

    नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।

    लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।

    ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।

    डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।

    हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।

    मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।

    नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।

    रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।

  130. Dohā / Sorṭhā

    2.130

    सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।

    सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।

  131. Caupāī

    2.131

    सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।

    सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।

    उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।

    बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।

    लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।

    दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।

    मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।

  132. Dohā / Sorṭhā

    2.132

    प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।

    तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।

  133. Caupāī

    2.133

    मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।

    सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।

    जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।

    तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।

    भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।

    प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।

    जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।

    नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।

  134. Dohā / Sorṭhā

    2.134

    खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।

    नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।

  135. Caupāī

    2.135

    बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।

    कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।

    कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।

    छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।

    बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।

    प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।

    अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।

    बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।

  136. Dohā / Sorṭhā

    2.136

    राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।

    दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।

  137. Caupāī

    2.137

    मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।

    सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।

    पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।

    श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।

    सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।

    बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।

    को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।

    मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।

  138. Dohā / Sorṭhā

    2.138

    ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।

    तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।

  139. Caupāī

    2.139

    अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।

    देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।

    कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।

    नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।

    कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।

    बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।

    फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।

    सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।

  140. Dohā / Sorṭhā

    2.140

    बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।

    कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।

  141. Caupāī

    2.141

    लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।

    राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।

    तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।

    सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।

    तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।

    सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।

    बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।

    अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।

  142. Dohā / Sorṭhā

    2.142

    सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।

    चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।

  143. Caupāī

    2.143

    समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।

    कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।

    कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।

    सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।

    मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।

    राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।

    बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।

    तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।

  144. Dohā / Sorṭhā

    2.144

    मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।

    लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।

  145. Caupāī

    2.145

    अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।

    भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।

    मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।

    गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।

    रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।

    जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।

    रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।

    सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।

  146. Dohā / Sorṭhā

    2.146

    उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।

    नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।

  147. Caupāī

    2.147

    दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।

    नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।

    मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।

    गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।

    जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।

    मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।

    धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।

    मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

  148. Dohā / Sorṭhā

    2.148

    करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।

    समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।

  149. Caupāī

    2.149

    मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।

    मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।

    हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।

    जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।

    पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।

    गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।

    लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।

    मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।

  150. Dohā / Sorṭhā

    2.150

    समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।

    नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।

  151. Caupāī

    2.151

    धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।

    तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।

    अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।

    जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।

    गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।

    रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।

    पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।

    अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।

  152. Dohā / Sorṭhā

    2.152

    भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।

    जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।

  153. Caupāī

    2.153

    पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।

    नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।

    तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।

    सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।

    राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।

    सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।

    तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।

    जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।

  154. Chanda

    2.154

    उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।

    पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।

    तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।

    रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।

  155. Dohā / Sorṭhā

    2.155

    मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।

    बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।

  156. Caupāī

    2.156

    गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।

    बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।

    कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।

    तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।

    कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।

    भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।

    सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।

    सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।

  157. Dohā / Sorṭhā

    2.157

    सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।

    बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।

  158. Caupāī

    2.158

    सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।

    नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।

    पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।

    तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।

    सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।

    सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।

    सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।

    करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।

  159. Dohā / Sorṭhā

    2.159

    औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।

    अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।

  160. Caupāī

    2.160

    रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।

    लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।

    तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।

    कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।

    औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।

    सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।

    तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।

  161. Dohā / Sorṭhā

    2.161

    -सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।

    सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।

  162. Caupāī

    2.162

    सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।

    मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।

    नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।

    सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।

    अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।

    भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।

    लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।

    रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

  163. Dohā / Sorṭhā

    2.163

    सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।

    बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।

  164. Caupāī

    2.164

    निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।

    कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।

    गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।

    जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।

    दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।

    सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।

    बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।

  165. Dohā / Sorṭhā

    2.165

    मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।

    सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।

  166. Caupāī

    2.166

    एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।

    गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।

    राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।

    कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।

    गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।

    रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।

    एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।

    पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।

  167. Dohā / Sorṭhā

    2.167

    -सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।

    रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।

  168. Caupāī

    2.168

    जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।

    तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।

    जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।

    सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।

    पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।

    एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।

    नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।

    अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।

  169. Dohā / Sorṭhā

    2.169

    -पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।

    गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।

  170. Caupāī

    2.170

    तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।

    चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।

    चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।

    कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।

    लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।

    घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।

    घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।

    बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।

  171. Dohā / Sorṭhā

    2.171

    हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

    पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।

  172. Caupāī

    2.172

    राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

    नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।

    बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।

    सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।

    सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।

    जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।

    चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।

    राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।

  173. Dohā / Sorṭhā

    2.173

    बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।

    तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।

  174. Caupāī

    2.174

    रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।

    करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।

    कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।

    किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।

    सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।

    लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।

    जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।

    खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।

  175. Dohā / Sorṭhā

    2.175

    राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।

    सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।

  176. Caupāī

    2.176

    जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।

    रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।

    मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।

    एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।

    निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।

    जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।

    एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।

    बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।

  177. Dohā / Sorṭhā

    2.177

    राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।

    मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।

  178. Caupāī

    2.178

    सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।

    उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।

    लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।

    गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।

    कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।

    सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।

    मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।

    सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।

  179. Dohā / Sorṭhā

    2.179

    सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।

    चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।

  180. Caupāī

    2.180

    यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।

    लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।।

    करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।

    सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।

    नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।

    देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।

    कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।

    कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।

  181. Dohā / Sorṭhā

    2.181

    बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।

    ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।

  182. Caupāī

    2.182

    राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

    एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।

    तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।

    लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।

    पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।

    गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।

    सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।

  183. Dohā / Sorṭhā

    2.183

    सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।

    सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।

  184. Caupāī

    2.184

    उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।

    कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।

    गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।

    आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।

    सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।

    तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।

    भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।

    मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।

  185. Dohā / Sorṭhā

    2.185

    सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।

    पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।

  186. Caupāī

    2.186

    बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।

    तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।

    ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।

    मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।।

    जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।

    पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।

    रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।।

    सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।

  187. Dohā / Sorṭhā

    2.187

    कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

    जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।

  188. Caupāī

    2.188

    भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।

    भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।

    बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।

    काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

    जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।

    जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।।

    धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।

    देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।

  189. Dohā / Sorṭhā

    2.189

    सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।

    जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।

  190. Caupāī

    2.190

    अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।

    मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।

    एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।

    जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।

    होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

    सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

    राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।

    सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।

  191. Dohā / Sorṭhā

    2.191

    भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।

    करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।

  192. Caupāī

    2.192

    सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।

    कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।।

    सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।।

    अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।

    हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।।

    नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।।

    बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।

    लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।

  193. Dohā / Sorṭhā

    2.193

    नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।

    करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।

  194. Caupāī

    2.194

    तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।

    मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।

    सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।।

    रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।

    धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।

    मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।

    संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।।

    तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।

  195. Dohā / Sorṭhā

    2.195

    पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

    चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।

  196. Caupāī

    2.196

    तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।

    सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।

    सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।

    पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।

    सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।

    कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।

    जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।

    नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।

  197. Dohā / Sorṭhā

    2.197

    मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।

    तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।

  198. Caupāī

    2.198

    बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।

    पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।

    सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।

    सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।

    प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।

    प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।

    पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।

    तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।

  199. Dohā / Sorṭhā

    2.199

    आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।

    आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।

  200. Caupāī

    2.200

    पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।

    सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।

    ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

    आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।।

    ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।

    बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।

    अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।।

    कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।

  201. Dohā / Sorṭhā

    2.201

    सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।

    मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।

  202. Caupāī

    2.202

    प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।

    नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।

    सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।

    नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।

    राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।

    जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।

    मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।।

    राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।

  203. Dohā / Sorṭhā

    2.203

    -रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।

    देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।

  204. Caupāī

    2.204

    जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।

    बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।

    मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।

    चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।

    छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।

    तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

    एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।।

    जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।

  205. Chanda

    2.205

    पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।

    मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं।।

    बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।

    तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।

  206. Dohā / Sorṭhā

    2.206

    सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।

    बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।100।।

  207. Caupāī

    2.207

    कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।

    वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।

    जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।

    सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।

    पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।

    केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।

    अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।

    बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।

  208. Dohā / Sorṭhā

    2.208

    पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

    पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।

  209. Caupāī

    2.209

    उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।

    केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।

    पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

    कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।

    नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।

    बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।

    अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।

    फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।

  210. Dohā / Sorṭhā

    2.210

    बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।

    बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।

  211. Caupāī

    2.211

    तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।

    सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।

    पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।

    सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।

    सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।

    लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।

    तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।

    तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।

  212. Dohā / Sorṭhā

    2.212

    प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।

    पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।

  213. Caupāī

    2.213

    गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।

    तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।

    दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।

    नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।

    जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।

    तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।।

    सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।

    पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।

  214. Dohā / Sorṭhā

    2.214

    तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।

    सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।

  215. Caupāī

    2.215

    तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

    प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।

    सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।

    चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।

    छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।

    सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।

    संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।

    चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।

  216. Dohā / Sorṭhā

    2.216

    सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।

    बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।

  217. Caupāī

    2.217

    को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।

    अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।

    कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।

    करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।

    एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।

    मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।

    तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।

    मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।

  218. Dohā / Sorṭhā

    2.218

    दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।

    लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।

  219. Caupāī

    2.219

    कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।

    कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।।

    सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।

    भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।

    आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।

    सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।

    लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।

    अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।

  220. Dohā / Sorṭhā

    2.220

    करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।

    तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।

  221. Caupāī

    2.221

    सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।

    तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।

    सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।

    मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।

    यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।

    भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।

    राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।

    देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।

  222. Dohā / Sorṭhā

    2.222

    राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।

    चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।

  223. Caupāī

    2.223

    राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

    मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

    साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।

    सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।

    मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।

    करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।।

    ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।

    होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।

  224. Dohā / Sorṭhā

    2.224

    बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।

    उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।

  225. Caupāī

    2.225

    सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।

    लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।

    अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।।

    जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।

    सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।

    सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।।

    तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।

    कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।

  226. Dohā / Sorṭhā

    2.226

    सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।

    परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।

  227. Caupāī

    2.227

    राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।

    मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।

    बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।

    पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।

    कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।

    पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

    राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।

  228. Dohā / Sorṭhā

    2.228

    तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।

    राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।

  229. Caupāī

    2.229

    पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।

    चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।

    पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।

    राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।।

    मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।।

    अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।।

    करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।।

    जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।

  230. Dohā / Sorṭhā

    2.230

    एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।

    कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।

  231. Caupāī

    2.231

    जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।

    केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।

    जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।।

    पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।।

    जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।

    जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।।

    जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।

    परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।

  232. Dohā / Sorṭhā

    2.232

    छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।

    देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।

  233. Caupāī

    2.233

    सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।

    सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।

    राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।।

    सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।

    बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।

    एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।।

    रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।

    एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।

  234. Dohā / Sorṭhā

    2.234

    एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।

    कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।

  235. Caupāī

    2.235

    एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।

    सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।

    जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।

    मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।

    एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।

    तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।

    दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।

    मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।

  236. Dohā / Sorṭhā

    2.236

    जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।

    सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।

  237. Caupāī

    2.237

    बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।

    राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।

    थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।।

    सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।।

    बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।।

    राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।

    स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।।

    राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।

  238. Dohā / Sorṭhā

    2.238

    स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।

    सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।

  239. Caupāī

    2.239

    कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।

    सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।।

    तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।।

    सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।

    सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।

    बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।

    खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।।

    भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।

  240. Dohā / Sorṭhā

    2.240

    अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।

    सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।

  241. Caupāī

    2.241

    पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।

    पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।।

    दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।।

    मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।

    तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।

    सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।

    मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।

    समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।

  242. Dohā / Sorṭhā

    2.242

    लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।

    फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।

  243. Caupāī

    2.243

    फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।

    सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।।

    निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।

    रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।

    जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।

    ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।

    ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।

    तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।

  244. Dohā / Sorṭhā

    2.244

    जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।

    बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार।।119।।

  245. Caupāī

    2.245

    जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।

    एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।

    जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।

    देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।।

    इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।

    कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।

    एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।

    ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।

  246. Dohā / Sorṭhā

    2.246

    एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।

    किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।

  247. Caupāī

    2.247

    नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।

    मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।।

    परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।

    जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।

    जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।।

    जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।

    सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।

    समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।

  248. Dohā / Sorṭhā

    2.248

    अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।।

    होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।

  249. Caupāī

    2.249

    गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।

    जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।

    कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।

    कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।।

    ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।।

    धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।।

    सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।

    राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।

  250. Dohā / Sorṭhā

    2.250

    एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।

    जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।

  251. Caupāī

    2.251

    आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।

    उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।

    बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।

    उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।

    प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।

    सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।

    राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।

    खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।

  252. Dohā / Sorṭhā

    2.252

    जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।

    भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।

  253. Caupāī

    2.253

    अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।

    राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।।

    तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।

    तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।

    देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।

    राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।

    सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।

    खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।

  254. Dohā / Sorṭhā

    2.254

    सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।

    सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।

  255. Caupāī

    2.255

    मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।

    देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।

    मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।

    सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।

    बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।

    तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।

    तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।।

    अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।

  256. Dohā / Sorṭhā

    2.256

    तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।

    मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।

  257. Caupāī

    2.257

    देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।

    अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।

    मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।

    मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।

    अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।

    तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।

    सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।

    कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।

  258. Chanda

    2.258

    श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

    जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की।।

    जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।

    सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।

  259. Dohā / Sorṭhā

    2.259

    राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

    अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह।।126।।

  260. Caupāī

    2.260

    जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।

    तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।

    सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।

    तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।

    चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।

    नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।

    राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।।

    तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।

  261. Dohā / Sorṭhā

    2.261

    पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

    जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।

  262. Caupāī

    2.262

    सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।

    बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।

    सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।

    जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।

    भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।

    लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।

    निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।

    तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।

  263. Dohā / Sorṭhā

    2.263

    जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।

    मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।

  264. Caupāī

    2.264

    प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।

    तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।

    सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।

    कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।।

    चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

    मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।

    तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।

    तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।

  265. Dohā / Sorṭhā

    2.265

    सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।

    तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।।129।।

  266. Caupāī

    2.266

    काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

    जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

    सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।

    कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।।

    तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

    जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।

    जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।

    जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

  267. Dohā / Sorṭhā

    2.267

    स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।

    मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।

  268. Caupāī

    2.268

    अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

    नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।

    गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।

    राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।

    जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।

    सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।

    सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।

    करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।

  269. Dohā / Sorṭhā

    2.269

    जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।

    बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।

  270. Caupāī

    2.270

    एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।

    कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।

    चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।

    सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।

    नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।

    सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।

    अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।

    चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।

  271. Dohā / Sorṭhā

    2.271

    चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।

    आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।

  272. Caupāī

    2.272

    रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

    लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।

    नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।।

    चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।

    अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।

    रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।

    कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।

    बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।

  273. Dohā / Sorṭhā

    2.273

    लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।

    सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।

  274. Caupāī

    2.274

    अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।

    राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।

    बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।

    करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।

    चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।

    आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।

    मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।।

    सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।

  275. Dohā / Sorṭhā

    2.275

    जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।

    करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।

  276. Caupāī

    2.276

    यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।

    कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।

    तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।

    कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।।

    करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।

    चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।

    राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।

    प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।

  277. Dohā / Sorṭhā

    2.277

    अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।

    भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।

  278. Caupāī

    2.278

    धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

    धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।

    हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।

    कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।

    हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।

    बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।

    तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।

    हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।

  279. Dohā / Sorṭhā

    2.279

    बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।

    बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।

  280. Caupāī

    2.280

    रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

    राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।

    बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।

    एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।

    जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।

    फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।

    सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।

    गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।

  281. Dohā / Sorṭhā

    2.281

    नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।

    भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।

  282. Caupāī

    2.282

    केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

    फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।

    बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।

    सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।।

    सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।

    उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।

    सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।

    बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।

  283. Dohā / Sorṭhā

    2.283

    चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।

    पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।

  284. Caupāī

    2.284

    नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

    परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।

    सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।

    महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।

    पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।

    कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।

    सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।

    सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।

  285. Dohā / Sorṭhā

    2.285

    -छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।

    करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।

  286. Caupāī

    2.286

    राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।

    छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।।

    नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।

    परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।।

    सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।।

    नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।।

    लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।

  287. Dohā / Sorṭhā

    2.287

    -सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।

    रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।

  288. Caupāī

    2.288

    सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।

    कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।

    जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।

    सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।

    कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।

    लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।

    प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।

    लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।

  289. Dohā / Sorṭhā

    2.289

    रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।

    जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।

  290. Caupāī

    2.290

    जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।

    सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।

    एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।

    कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।

    फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।

    मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।

    राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।

    देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।

  291. Dohā / Sorṭhā

    2.291

    नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।

    ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।

  292. Caupāī

    2.292

    धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।

    तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता

    बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।

    सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।

    चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।

    अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।

    जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।

    बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।

  293. Dohā / Sorṭhā

    2.293

    भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।

    बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।

  294. Caupāī

    2.294

    गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।

    चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।

    सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।

    रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।

    भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।

    अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।

    मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।

    बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।

  295. Dohā / Sorṭhā

    2.295

    बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।

    जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।

  296. Caupāī

    2.296

    जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।

    रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।

    लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।

    सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।

    बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।

    हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।

    बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।

    राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।

  297. Dohā / Sorṭhā

    2.297

    -धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।

    उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।

  298. Caupāī

    2.298

    पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।

    पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।

    राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।

    पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।

    जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।

    पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।

    देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।

    सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।

  299. Dohā / Sorṭhā

    2.299

    -ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।

    जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।

  300. Caupāī

    2.300

    एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।

    बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।

    पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।

    बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।

    अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।

    जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।

    रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।

    नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।

  301. Dohā / Sorṭhā

    2.301

    -सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।

    भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।

  302. Caupāī

    2.302

    अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।

    सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।

    दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।

    जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।

    आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।

    लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।

    लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।

    राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।

  303. Dohā / Sorṭhā

    2.303

    देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।

    सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।

  304. Caupāī

    2.304

    भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।

    सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।

    राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।

    आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।

    सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।

    राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।

    राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।

    सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।

  305. Dohā / Sorṭhā

    2.305

    सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।

    नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।

  306. Caupāī

    2.306

    पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

    करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।

    सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।

    बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।

    जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।

    काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।

    सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।

    धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।

  307. Dohā / Sorṭhā

    2.307

    प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।

    न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।

  308. Caupāī

    2.308

    केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

    होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।

    राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।

    लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।

    बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।।

    तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।।

    करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।।

    बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।

  309. Chanda

    2.309

    तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।

    प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं।।

    जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी।

    तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी।।

  310. Dohā / Sorṭhā

    2.310

    गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।

    करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।151।।

  311. Caupāī

    2.311

    पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।

    कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।

    पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।

    ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।

    तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।

    लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।

    बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।

  312. Dohā / Sorṭhā

    2.312

    कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।

    थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।

  313. Caupāī

    2.313

    तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।

    रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।

    मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।

    अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।।

    सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।

    तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।

    करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।।

    सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।

  314. Dohā / Sorṭhā

    2.314

    भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।

    बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।

  315. Caupāī

    2.315

    प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

    इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।

    कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।

    उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।

    नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।।

    करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।

    धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।

    जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।

  316. Dohā / Sorṭhā

    2.316

    प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।

    तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।

  317. Caupāī

    2.317

    धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

    कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।

    बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।

    तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।

    भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।

    सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।

    हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

    हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।

  318. Dohā / Sorṭhā

    2.318

    राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।

    तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।

  319. Caupāī

    2.319

    जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।

    जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।।

    सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।।

    करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।।

    बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।

    अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।।

    गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।

    एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।

  320. Dohā / Sorṭhā

    2.320

    तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।

    सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।

  321. Caupāī

    2.321

    तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

    धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।

    एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।

    सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।।

    अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।

    देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।

    बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।

    मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।

  322. Dohā / Sorṭhā

    2.322

    एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।

    गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।

  323. Caupāī

    2.323

    चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।

    हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।

    एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।।

    असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।

    खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।

    श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।

    खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।।

    नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।

  324. Dohā / Sorṭhā

    2.324

    पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।

    भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।

  325. Caupāī

    2.325

    हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

    आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।

    सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।

    भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।

    कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।

    सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।।

    सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।

    कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।

  326. Dohā / Sorṭhā

    2.326

    सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।

    भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।

  327. Caupāī

    2.327

    तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।

    कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।

    सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।

    तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।।

    चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।।

    बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।

    सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।

    आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।

  328. Dohā / Sorṭhā

    2.328

    भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।

    हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।

  329. Caupāī

    2.329

    बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

    तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।

    जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।

    अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।

    सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।

    धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।

    जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।।

    पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।

  330. Dohā / Sorṭhā

    2.330

    हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।

    जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।

  331. Caupāī

    2.331

    जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।

    बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।

    भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।

    बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

    सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।

    अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।

    भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।।

    जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।

  332. Dohā / Sorṭhā

    2.332

    राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।

    मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।

  333. Caupāī

    2.333

    सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

    तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।

    लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।

    हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।

    कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।

    आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।

    सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।

    भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।

  334. Dohā / Sorṭhā

    2.334

    मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।

    कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।

  335. Caupāī

    2.335

    भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

    देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।

    मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।

    कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।

    कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।

    को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।

    पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।।

    धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।

  336. Dohā / Sorṭhā

    2.336

    मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।

    लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।

  337. Caupāī

    2.337

    सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

    भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।

    देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।।

    माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।

    अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।

    जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।।

    काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।

    जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।

  338. Dohā / Sorṭhā

    2.338

    पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।

    बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।

  339. Caupāī

    2.339

    मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

    चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।।

    सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।

    तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।

    रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।।

    यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।।

    मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।।

    जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।

  340. Dohā / Sorṭhā

    2.340

    कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।

    ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।

  341. Caupāī

    2.341

    बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

    भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।

    भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।

    छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।।

    जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।

    जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।।

    जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।।

    ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।

  342. Dohā / Sorṭhā

    2.342

    जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।

    तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।

  343. Caupāī

    2.343

    बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

    कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।

    लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।।

    पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।।

    जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।।

    जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।

    तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।

    तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।

  344. Dohā / Sorṭhā

    2.344

    मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।

    कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।

  345. Caupāī

    2.345

    राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

    बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।

    भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।

    मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।

    अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।

    करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।

    बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

    मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

  346. Dohā / Sorṭhā

    2.346

    तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।

    उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।

  347. Caupāī

    2.347

    नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।

    गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।

    चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।

    सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।

    एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।

    सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।

    जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।

    भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।

  348. Dohā / Sorṭhā

    2.348

    सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।

    दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।

  349. Caupāī

    2.349

    पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।

    सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

    बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।

    भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।

    प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।

    भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।

    कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।

    बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।

  350. Dohā / Sorṭhā

    2.350

    सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

    हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।

  351. Caupāī

    2.351

    अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।

    तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।

    सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।

    सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।

    सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।

    सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।

    सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।

    सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।

  352. Dohā / Sorṭhā

    2.352

    सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।

    सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।

  353. Caupāī

    2.353

    बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

    सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।

    सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।

    सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।

    सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

    भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।

    बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।

  354. Dohā / Sorṭhā

    2.354

    कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।

    राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।

  355. Caupāī

    2.355

    सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।

    यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।

    राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।

    तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।

    नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।

    करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।

    परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।

    तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।

  356. Dohā / Sorṭhā

    2.356

    अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।

    ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।

  357. Caupāī

    2.357

    अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।

    सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।

    बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।

    करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।

    सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।

    कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।

    परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।

    सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।

  358. Dohā / Sorṭhā

    2.358

    कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।

    रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।

  359. Caupāī

    2.359

    कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।

    सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।

    बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।

    परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।

    लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।

    सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।

    गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।

    सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।

  360. Chanda

    2.360

    सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।

    लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।।

    सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।

    तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।।

  361. Dohā / Sorṭhā

    2.361

    भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।

    बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।।

  362. Caupāī

    2.362

    मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।

    मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।

    गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।

    उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।।

    तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।

    जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।

    अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।

    ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।

  363. Dohā / Sorṭhā

    2.363

    पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।

    एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।

  364. Caupāī

    2.364

    हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।

    मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।

    सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।।

    बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।

    सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।

    जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।

    जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।।

    मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।

  365. Dohā / Sorṭhā

    2.365

    कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।

    तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।

  366. Caupāī

    2.366

    कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।

    मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।

    मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।।

    रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।

    मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।

    बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।

    राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।।

    कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।

  367. Dohā / Sorṭhā

    2.367

    कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।

    कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।

  368. Caupāī

    2.368

    कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

    जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।

    लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।

    लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।

    मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।

    एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।

    कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।

    मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।

  369. Dohā / Sorṭhā

    2.369

    ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।

    तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।

  370. Caupāī

    2.370

    कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

    दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।

    तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।।

    उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।

    मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।

    मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।

    परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।

    संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।

  371. Dohā / Sorṭhā

    2.371

    राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।

    कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।

  372. Caupāī

    2.372

    गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

    मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।

    परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।

    सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।

    डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।।

    एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।

    जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।।

    मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।

  373. Dohā / Sorṭhā

    2.373

    आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।

    देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।

  374. Caupāī

    2.374

    आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

    एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।

    जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।।

    तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।

    सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।

    अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।

    तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।

    जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।

  375. Dohā / Sorṭhā

    2.375

    जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।

    आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।

  376. Caupāī

    2.376

    भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

    लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।

    मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।

    भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।

    तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।।

    जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।

    सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।

    अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।

  377. Dohā / Sorṭhā

    2.377

    अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।

    सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।

  378. Caupāī

    2.378

    भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

    चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।

    मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।।

    धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।

    कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।।

    जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।

    कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।

  379. Dohā / Sorṭhā

    2.379

    जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।

    सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।

  380. Caupāī

    2.380

    घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

    भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।

    संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।

    तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।

    करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।।

    अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।

    कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।

    करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।

  381. Dohā / Sorṭhā

    2.381

    आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।

    कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।

  382. Caupāī

    2.382

    चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।

    जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।।

    कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।

    बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।

    अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।

    बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।

    नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।

    सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।

  383. Dohā / Sorṭhā

    2.383

    सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।

    सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।

  384. Caupāī

    2.384

    राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

    बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।

    देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।

    जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।।

    तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।

    तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।

    सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।

    तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।

  385. Dohā / Sorṭhā

    2.385

    पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।

    करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।

  386. Caupāī

    2.386

    सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।

    समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।

    कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।।

    जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।

    जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।।

    भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।

    सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।।

    का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।

  387. Dohā / Sorṭhā

    2.387

    अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।

    हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।

  388. Caupāī

    2.388

    होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।

    सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।

    समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।।

    भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।

    स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।

    तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।

    साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।

    जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।

  389. Dohā / Sorṭhā

    2.389

    बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।

    सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।

  390. Caupāī

    2.390

    बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

    भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।

    चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।

    सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।

    अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।

    एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।

    निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।

    देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।

  391. Dohā / Sorṭhā

    2.391

    भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।

    सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।

  392. Caupāī

    2.392

    राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।

    जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।

    दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।

    एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।

    बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।

    रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।

    सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।

    भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।

  393. Dohā / Sorṭhā

    2.393

    गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।

    बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।

  394. Caupāī

    2.394

    लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।

    अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।

    मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।।

    मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।

    देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।

    जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।

    राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।

    गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।

  395. Dohā / Sorṭhā

    2.395

    करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।

    मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।

  396. Caupāī

    2.396

    भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।

    धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।

    लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।

    तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।

    राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।

    यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।

    करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।

    उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।

  397. Dohā / Sorṭhā

    2.397

    स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।

    रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।

  398. Caupāī

    2.398

    नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।

    राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।

    रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।

    देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।

    सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।

    धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।

    कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।

    अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।

  399. Dohā / Sorṭhā

    2.399

    समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।

    जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।

  400. Caupāī

    2.400

    कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।

    राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।

    देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।

    कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।।

    जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।

    निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।

    कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।

    सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।

  401. Dohā / Sorṭhā

    2.401

    सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।

    घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।

  402. Caupāī

    2.402

    सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।

    सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।

    एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।

    रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।

    करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।

    करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।

    भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।

    जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।

  403. Dohā / Sorṭhā

    2.403

    एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।

    मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।

  404. Caupāī

    2.404

    जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।

    सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।

    चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।।

    भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।

    चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।

    पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।

    जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।।

    भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।

  405. Dohā / Sorṭhā

    2.405

    जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।

    अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।

  406. Caupāī

    2.406

    कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।

    चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।

    कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।।

    सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।

    श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।

    पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।

    ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।।

    प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।

  407. Dohā / Sorṭhā

    2.407

    पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।

    बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।

  408. Caupāī

    2.408

    लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।

    पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।।

    मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।।

    ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।

    राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।।

    पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।।

    बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।।

    सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।

  409. Dohā / Sorṭhā

    2.409

    सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।

    ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।

  410. Caupāī

    2.410

    राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।

    पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।।

    ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।।

    धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।

    मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।

    कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।

    सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।।

    राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।

  411. Chanda

    2.411

    बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी।

    तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी।।

    तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ।

    परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ।।

  412. Dohā / Sorṭhā

    2.412

    अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।

    चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन।।201।।

  413. Caupāī

    2.413

    सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।

    यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।

    परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।।

    भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।।

    एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।।

    निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।।

    एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।।

    गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।।

    दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।

  414. Dohā / Sorṭhā

    2.414

    प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।

    आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।

  415. Caupāī

    2.415

    कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।

    साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।

    आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।।

    गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।

    कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।।

    रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।

    सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।

    देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।

  416. Dohā / Sorṭhā

    2.416

    भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।

    कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।

  417. Caupāī

    2.417

    झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।

    भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।

    खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।।

    सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।।

    देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।।

    सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।

    मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।।

    अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।

  418. Dohā / Sorṭhā

    2.418

    अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।

    जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।

  419. Caupāī

    2.419

    जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।

    सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

    जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।

    चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।।

    कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।

    भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।

    तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।।

    बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।

  420. Dohā / Sorṭhā

    2.420

    तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।

    भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।

  421. Caupāī

    2.421

    प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।

    कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।।

    सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।।

    दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

    धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।

    आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।

    मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।।

    सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

  422. Dohā / Sorṭhā

    2.422

    तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।

    तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।

  423. Caupāī

    2.423

    यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।

    तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।

    लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।।

    राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।।

    राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।।

    सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।।

    तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।।

    करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।

  424. Dohā / Sorṭhā

    2.424

    अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।

    सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।

  425. Caupāī

    2.425

    सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।

    यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।

    सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।

    लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।

    जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।

    तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।

    यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।।

    तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।

  426. Dohā / Sorṭhā

    2.426

    तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।

    राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।

  427. Caupāī

    2.427

    नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।

    उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।

    कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।

    निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।

    पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।।

    राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।।

    भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।।

    दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।

  428. Dohā / Sorṭhā

    2.428

    जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।।

    जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।

  429. Caupāī

    2.429

    कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

    तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।।

    सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।

    सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।

    तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।

    भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।

    सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

    धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।

  430. Dohā / Sorṭhā

    2.430

    पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।

    करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।

  431. Caupāī

    2.431

    मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

    एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।

    तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।।

    मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।

    नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।

    सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।।

    राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।

    राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।

  432. Dohā / Sorṭhā

    2.432

    अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।

    बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।

  433. Caupāī

    2.433

    एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।

    एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।

    मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।

    कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।

    मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।।

    मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।

    भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।

    तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।

  434. Dohā / Sorṭhā

    2.434

    करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।

    कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।

  435. Caupāī

    2.435

    सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

    जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।।

    सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।

    भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।

    चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।

    भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।

    मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।

    सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।

  436. Dohā / Sorṭhā

    2.436

    राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।

    पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।

  437. Caupāī

    2.437

    रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

    कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।

    मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।।

    अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।

    भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।

    दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।

    सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।

    प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।

  438. Dohā / Sorṭhā

    2.438

    बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।

    बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।

  439. Caupāī

    2.439

    मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।

    सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।

    आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।।

    सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।

    असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।।

    सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।

    रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।

    स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

  440. Dohā / Sorṭhā

    2.440

    संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।

    तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।

  441. Caupāī

    2.441

    कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

    रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।

    पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।

    रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।।

    नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।

    लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।

    राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।

    दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।

  442. Dohā / Sorṭhā

    2.442

    किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।

    तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।

  443. Caupāī

    2.443

    जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

    ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।।

    यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।

    बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।।

    भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।।

    सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।

    देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।

    गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।

  444. Dohā / Sorṭhā

    2.444

    रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।

    बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।

  445. Caupāī

    2.445

    बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

    मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।

    तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।।

    सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।

    जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।

    लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।

    भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।

  446. Dohā / Sorṭhā

    2.446

    मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।

    अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।

  447. Caupāī

    2.447

    सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।

    मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।।

    जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।

    करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

    तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।।

    अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।।

    राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।

    अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।

  448. Dohā / Sorṭhā

    2.448

    राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।

    भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।

  449. Caupāī

    2.449

    सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।

    स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।।

    सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।।

    बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।।

    एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।

    जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा।।

    द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।।

    बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए।।

  450. Dohā / Sorṭhā

    2.450

    रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।

    होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।।

  451. Caupāī

    2.451

    जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।

    रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।।

    प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ।।

    चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।

    आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें।।

    तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।

    सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।।

    जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।।

  452. Dohā / Sorṭhā

    2.452

    मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।

    देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।।

  453. Caupāī

    2.453

    कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।

    बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।

    बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा।।

    नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।

    तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।।

    तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।।

    कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।।

    भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।

  454. Dohā / Sorṭhā

    2.454

    चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।

    जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।।

  455. Caupāī

    2.455

    भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।

    जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।

    हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।

    सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।

    कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।

    कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।

    बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।

    अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।

  456. Dohā / Sorṭhā

    2.456

    भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।

    जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।।

  457. Caupāī

    2.457

    निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

    तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।।

    मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।।

    मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।

    करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।।

    ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।।

    जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।।

    एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।।

  458. Dohā / Sorṭhā

    2.458

    तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।

    राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।

  459. Caupāī

    2.459

    मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।

    भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू।।

    करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।

    सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।

    रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।

    जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।

    देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।।

    प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।

  460. Dohā / Sorṭhā

    2.460

    भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।

    कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।

  461. Caupāī

    2.461

    सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।

    जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।

    उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।।

    सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।।

    सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।।

    सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।

    लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।

    अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।।

  462. Chanda

    2.462

    सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए।

    नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।।

    तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।

    सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे।।

  463. Dohā / Sorṭhā

    2.463

    सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।

    सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल।।226।।

  464. Caupāī

    2.464

    बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।

    एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।

    सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।

    भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।

    समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।

    लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।

    बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।

    तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।

  465. Dohā / Sorṭhā

    2.465

    नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।

    सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।

  466. Caupāī

    2.466

    बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।

    भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।

    तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।

    कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।

    करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।

    कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।

    जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।

    भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।

  467. Dohā / Sorṭhā

    2.467

    ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।

    लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।

  468. Caupāī

    2.468

    सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

    भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।

    एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।

    समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।

    एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।

    प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।

    अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।

    कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।

  469. Dohā / Sorṭhā

    2.469

    छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।

    लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।

  470. Caupāī

    2.470

    उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।

    बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।

    आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।

    राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।

    आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।

    जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।

    तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।

    जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।

  471. Dohā / Sorṭhā

    2.471

    अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।

    सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।

  472. Caupāī

    2.472

    जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।

    तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।

    अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।

    सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।

    सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।

    कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।

    जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।

    सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।

  473. Dohā / Sorṭhā

    2.473

    भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।

    कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।

  474. Caupāī

    2.474

    तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।

    लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।

    सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।

    भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।

    गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।

  475. Dohā / Sorṭhā

    2.475

    सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।

    सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।

  476. Caupāī

    2.476

    जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।

    कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।

    लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।

    इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।

    सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।

    चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।

    समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।

    रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।

  477. Dohā / Sorṭhā

    2.477

    मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।

    अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।

  478. Caupāī

    2.478

    जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।

    मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।

    जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।

    अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।

    फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।

    जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।

    भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।

    देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।

  479. Dohā / Sorṭhā

    2.479

    लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।

    मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।

  480. Caupāī

    2.480

    सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।

    भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।

    ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।

    जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।

    राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।

    सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।

    भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।

    सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।

  481. Dohā / Sorṭhā

    2.481

    जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।

    करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।

  482. Caupāī

    2.482

    बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।

    बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।

    खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।

    बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।

    झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।

    चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।

    अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।

    बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।

  483. Dohā / Sorṭhā

    2.483

    राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।

    तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।

  484. Caupāī

    2.484

    तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।

    नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।

    जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।

    नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।

    मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।

    ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।

    तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।

    बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।

  485. Dohā / Sorṭhā

    2.485

    जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।

    सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।

  486. Caupāī

    2.486

    सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।

    करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।

    हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।।

    रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।

    देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

    सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।

    निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।

    होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।

  487. Dohā / Sorṭhā

    2.487

    पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।

    मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।

  488. Caupāī

    2.488

    सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।

    भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।

    करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।।

    देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।।

    सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।।

    बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।।

    बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।

    कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।

  489. Dohā / Sorṭhā

    2.489

    लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।

    ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।

  490. Caupāī

    2.490

    सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।

    पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।

    बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।

    बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।

    मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।

    रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।

    कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।

    उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।

  491. Dohā / Sorṭhā

    2.491

    बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।

    भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।

  492. Caupāī

    2.492

    मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।

    परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।

    कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।।

    कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।

    अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।।

    सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।।

    मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।।

    समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।

  493. Dohā / Sorṭhā

    2.493

    मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।

    भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।

  494. Caupāī

    2.494

    भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।

    पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।

    सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।

    पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।

    सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।

    सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।

    कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।

    तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।

  495. Dohā / Sorṭhā

    2.495

    नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।

    सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।

  496. Caupāī

    2.496

    सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।

    चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।।

    गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।

    मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।

    प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।

    रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।

    रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।

    एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।

  497. Dohā / Sorṭhā

    2.497

    जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।

    सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।

  498. Caupāī

    2.498

    आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।

    जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।

    सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।

    यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।

    मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।

    देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।

    प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।

    पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।

  499. Dohā / Sorṭhā

    2.499

    भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।

    अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।

  500. Caupāī

    2.500

    गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।

    गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।

    गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।।

    पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।।

    अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।।

    तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।।

    मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।।

    पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।

  501. Dohā / Sorṭhā

    2.501

    महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।।

    पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।

  502. Caupāī

    2.502

    सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।

    गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।

    बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।।

    सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।।

    परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।।

    तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।।

    जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।।

    मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।

  503. Dohā / Sorṭhā

    2.503

    लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।।

    हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।

  504. Caupāī

    2.504

    बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।

    कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।।

    नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।

    मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।।

    कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।।

    सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।।

    मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।

    ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।

  505. Dohā / Sorṭhā

    2.505

    भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।।

    श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।

  506. Caupāī

    2.506

    करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।

    जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।।

    सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।

    सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।

    नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।।

    सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।

    सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।।

    बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।

  507. Dohā / Sorṭhā

    2.507

    धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।

    लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।

  508. Caupāī

    2.508

    राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।

    सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।।

    पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।।

    मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।।

    राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।।

    झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।।

    बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।

    सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।

  509. Dohā / Sorṭhā

    2.509

    सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।

    बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।

  510. Caupāī

    2.510

    कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

    भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।

    सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।

    देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।।

    कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।।

    तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।

    हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।

    राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

  511. Dohā / Sorṭhā

    2.511

    यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।

    हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।

  512. Caupāī

    2.512

    तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।

    देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।।

    यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।।

    हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।

    पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।

    सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।

    जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।

    बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

  513. Chanda

    2.513

    लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।

    बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।।

    नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।

    तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।

  514. Dohā / Sorṭhā

    2.514

    बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।

    जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।251।।

  515. Caupāī

    2.515

    पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।

    सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।

    लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।।

    सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।

    लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।।

    अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।

    लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।

    यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

  516. Dohā / Sorṭhā

    2.516

    निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।

    नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।

  517. Caupāī

    2.517

    कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।

    केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।

    अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।

    मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।।

    मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।

    जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।

    एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।

    प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

  518. Dohā / Sorṭhā

    2.518

    गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।

    बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।

  519. Caupāī

    2.519

    बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

    धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।

    सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।

    गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।

    नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।।

    बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।

    अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।

    करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

  520. Dohā / Sorṭhā

    2.520

    राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।

    समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।

  521. Caupāī

    2.521

    सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।

    केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।

    सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।

    उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।

    भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।।

    जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।।

    दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।।

    सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

  522. Dohā / Sorṭhā

    2.522

    बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।

    सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।

  523. Caupāī

    2.523

    तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

    सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।

    तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।

    सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।।

    मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।।

    बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।

    कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।

    कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

  524. Dohā / Sorṭhā

    2.524

    अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।

    जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।

  525. Caupāī

    2.525

    भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

    भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।

    गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।।

    औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।

    भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।।

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।

    बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।।

    सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

  526. Dohā / Sorṭhā

    2.526

    सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।

    पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।

  527. Caupāī

    2.527

    आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

    सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।

    सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।

    प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।।

    पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।

    कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।

    तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।।

    मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

  528. Dohā / Sorṭhā

    2.528

    भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।

    करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।

  529. Caupāī

    2.529

    गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

    भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।

    बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।

    नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।

    जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।

    राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।।

    लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।

    भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

  530. Dohā / Sorṭhā

    2.530

    तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।

    कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।

  531. Caupāī

    2.531

    सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।

    लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।

    पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।

    कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।

    मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।

    मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

    सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।

    मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।

  532. Dohā / Sorṭhā

    2.532

    महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।

    दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।

  533. Caupāī

    2.533

    बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।

    यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।।

    मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।

    फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।

    सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।

    बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।

    हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।

    गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

  534. Dohā / Sorṭhā

    2.534

    साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।

    प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।

  535. Caupāī

    2.535

    भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।

    देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।

    महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।

    सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।

    बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।

    बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।

    अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।

    जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।

  536. Dohā / Sorṭhā

    2.536

    तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।

    तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।

  537. Caupāī

    2.537

    सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।

    सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।।

    कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।

    बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।

    तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।।

    तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।

    उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।

    दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।

  538. Dohā / Sorṭhā

    2.538

    मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।

    लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।

  539. Caupāī

    2.539

    कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।

    तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।।

    मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।।

    हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।

    तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।।

    राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।

    तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।।

    ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।

  540. Dohā / Sorṭhā

    2.540

    मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।

    सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।

  541. Caupāī

    2.541

    सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।

    बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।

    बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।

    सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।

    सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।

    लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।

    आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।।

    हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।

  542. Dohā / Sorṭhā

    2.542

    सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।

    सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।

  543. Caupāī

    2.543

    सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।

    भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।।

    देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।।

    मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।।

    सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।

    निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।

    करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।।

    निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।

  544. Dohā / Sorṭhā

    2.544

    कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।

    करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।

  545. Caupāī

    2.545

    कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।

    गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।

    अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।।

    मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।

    पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।।

    यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।।

    जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।।

    देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

  546. Dohā / Sorṭhā

    2.546

    जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।

    मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।

  547. Caupāī

    2.547

    लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।

    अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।

    जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।

    सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।

    स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।।

    यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।।

    देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।।

    तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

  548. Dohā / Sorṭhā

    2.548

    सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।

    नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।

  549. Caupāī

    2.549

    नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।

    जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।।

    देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।

    कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।

    उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।

    अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।

    अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।

    प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।

  550. Dohā / Sorṭhā

    2.550

    प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।

    सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।

  551. Caupāī

    2.551

    भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

    असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।।

    चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

    जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।

    करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।।

    दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।

    सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।।

    बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।

  552. Dohā / Sorṭhā

    2.552

    नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।

    मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।

  553. Caupāī

    2.553

    कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।

    जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।।

    रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।

    भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।

    नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।।

    समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।

    नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।।

    बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।

  554. Dohā / Sorṭhā

    2.554

    गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।

    चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।

  555. Caupāī

    2.555

    दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।

    सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।

    धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।।

    घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।।

    दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।।

    भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।

    खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।

    साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।

  556. Dohā / Sorṭhā

    2.556

    सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।

    रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।

  557. Caupāī

    2.557

    गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।

    अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।

    एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।

    करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।

    रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।

    राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।

    सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।

    एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।

  558. Dohā / Sorṭhā

    2.558

    गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।

    अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।

  559. Caupāī

    2.559

    सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।

    एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।

    ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।

    सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।

    लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।।

    सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।

    कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।।

    हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।

  560. Dohā / Sorṭhā

    2.560

    प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।

    सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।

  561. Caupāī

    2.561

    भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।

    गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।

    राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।

    मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।

    आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।।

    आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।।

    लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।

    भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।

  562. Dohā / Sorṭhā

    2.562

    आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।

    सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।

  563. Caupāī

    2.563

    बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।

    सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।

    बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।

    केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।

    बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।

    आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।

    सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।

    भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।

  564. Chanda

    2.564

    अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।

    दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।।

    सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।

    तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।

  565. Dohā / Sorṭhā

    2.565

    किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।

    धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।

  566. Caupāī

    2.566

    जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।

    तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।।

    बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।

    राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।

    सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।।

    मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।

    सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।

    पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।

  567. Dohā / Sorṭhā

    2.567

    दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।

    बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।

  568. Caupāī

    2.568

    जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।

    हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।

    लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।।

    कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।।

    तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।

    मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।

    रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।

    कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।

  569. Dohā / Sorṭhā

    2.569

    तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।

    लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।

  570. Caupāī

    2.570

    कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।

    सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।।

    बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।

    तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।

    जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।।

    तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।।

    देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।

    दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।

  571. Dohā / Sorṭhā

    2.571

    सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।

    पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।

  572. Caupāī

    2.572

    एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।

    दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।

    सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।

    परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।

    दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।।

    मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।

    अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।

    सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

  573. Dohā / Sorṭhā

    2.573

    एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।

    सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

  574. Caupāī

    2.574

    एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।

    सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।

    सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।।

    कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।।

    सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।

    पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।

    सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।

    सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

  575. Dohā / Sorṭhā

    2.575

    सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।

    जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

  576. Caupāī

    2.576

    सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।

    जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।

    कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।

    कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।

    ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।

    देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।

    भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।

    सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

  577. Dohā / Sorṭhā

    2.577

    लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।

    गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

  578. Caupāī

    2.578

    ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।

    राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।

    भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।।

    कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।

    जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।।

    कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।

    अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।

    सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

  579. Dohā / Sorṭhā

    2.579

    कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।

    को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

  580. Caupāī

    2.580

    रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।

    रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।।

    तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।।

    गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।

    लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।।

    नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।

    सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।

    देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।

  581. Dohā / Sorṭhā

    2.581

    बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।

    हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।

  582. Caupāī

    2.582

    लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।

    देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।।

    प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।

    सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।

    रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।

    रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।

    अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।

    यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।

  583. Dohā / Sorṭhā

    2.583

    अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।।

    सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।

  584. Caupāī

    2.584

    प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।

    तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।

    जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।

    लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।

    उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।

    सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।

    चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।

    मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।

  585. Dohā / Sorṭhā

    2.585

    सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।

    धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।

  586. Caupāī

    2.586

    तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।

    पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।

    जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।

    गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।

    पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।

    पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।

    कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।

    लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।

  587. Dohā / Sorṭhā

    2.587

    बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।

    कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।

  588. Caupāī

    2.588

    सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।

    मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।

    सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।

    धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।

    सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।।

    बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।

    भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।

    समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।

  589. Dohā / Sorṭhā

    2.589

    निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।

    कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।

  590. Caupāī

    2.590

    अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।

    भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।

    बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।

    बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।।

    देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।

    भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।।

    परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।

    साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।

  591. Dohā / Sorṭhā

    2.591

    भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।

    करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।

  592. Caupāī

    2.592

    राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।

    राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।

    गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।

    नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।

    सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।

    उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।

    अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।

    तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।

  593. Dohā / Sorṭhā

    2.593

    प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।

    तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।

  594. Caupāī

    2.594

    सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।

    जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।

    तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।

    राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।

    आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।

    करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।

    राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।

    महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।

  595. Dohā / Sorṭhā

    2.595

    ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।

    तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।

  596. Caupāī

    2.596

    सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।

    सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।

    रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।

    हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।

    तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।

    समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।

    भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।

    तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।

  597. Dohā / Sorṭhā

    2.597

    राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।

    संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।

  598. Caupāī

    2.598

    सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।

    प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।

    कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।

    सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।

    एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।

    छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।

    आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।

    स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।

  599. Dohā / Sorṭhā

    2.599

    राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।

    सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।

  600. Caupāī

    2.600

    भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।

    सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।

    ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।

    भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।

    सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।

    देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।

    राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।

    सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।

  601. Dohā / Sorṭhā

    2.601

    रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।

    रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।

  602. Caupāī

    2.602

    सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।

    फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।

    बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।

    मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।

    बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।

    सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।

    भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।

    अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।

  603. Dohā / Sorṭhā

    2.603

    सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।

    रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।

  604. Caupāī

    2.604

    करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।

    गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।

    समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।

    जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।

    तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।।

    सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।।

    बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।।

    राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।

  605. Dohā / Sorṭhā

    2.605

    राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।

    सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।

  606. Caupāī

    2.606

    सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।

    कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।

    सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।

    भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।।

    करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।।

    छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।

    हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।।

    बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।

  607. Dohā / Sorṭhā

    2.607

    निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।

    करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।

  608. Caupāī

    2.608

    प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।

    सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।

    समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।

    स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।

    प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।

    जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।

    राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।

    सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।

  609. Dohā / Sorṭhā

    2.609

    कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।

    दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।

  610. Caupāī

    2.610

    राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।

    कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।

    तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।

    देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।

    को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।।

    निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।

    सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।

    पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।

  611. Dohā / Sorṭhā

    2.611

    यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।

    को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।

  612. Caupāī

    2.612

    सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।

    तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।।

    देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।।

    बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।।

    कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।।

    राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।।

    नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।

    अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।

  613. Dohā / Sorṭhā

    2.613

    सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।

    आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।

  614. Caupāī

    2.614

    प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।

    सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।

    सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।

    अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।

    अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।

    प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।

    कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।।

    भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।

  615. Chanda

    2.615

    रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।

    मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी।।

    भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।

    तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से।।

  616. Dohā / Sorṭhā

    2.616

    देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।

    मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत।।301।।

  617. Caupāī

    2.617

    कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।

    काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।।

    प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।।

    सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।।

    भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।

    दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।

    दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।।

    लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।।

  618. Dohā / Sorṭhā

    2.618

    भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।

    लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।

  619. Caupāī

    2.619

    कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।

    सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।।

    रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।।

    भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।

    जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।।

    महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।।

    आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।।

    कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।

  620. Dohā / Sorṭhā

    2.620

    भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।

    उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।

  621. Caupāī

    2.621

    भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।

    कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।।

    सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।

    देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।

    धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।।

    देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।

    बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।।

    तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।

  622. Dohā / Sorṭhā

    2.622

    करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।

    गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।

  623. Caupāī

    2.623

    जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।

    समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।

    तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।।

    मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।।

    तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।।

    नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।।

    जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।।

    तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।

  624. Dohā / Sorṭhā

    2.624

    राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।

    गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।

  625. Caupāī

    2.625

    सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।

    मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।

    सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।।

    साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।

    सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।।

    बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।।

    जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।।

    होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।

  626. Dohā / Sorṭhā

    2.626

    सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।

    तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।

  627. Caupāī

    2.627

    सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।

    सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।

    भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।

    मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।

    कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।।

    नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।।

    अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।।

    सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।

  628. Dohā / Sorṭhā

    2.628

    देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।

    आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।

  629. Caupāī

    2.629

    एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।

    कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।।

    चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।।

    प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।।

    अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।।

    मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।

    रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।

    सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।

  630. Dohā / Sorṭhā

    2.630

    भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।

    सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।

  631. Caupāī

    2.631

    धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।

    मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।

    भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।

    सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।

    मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।।

    सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।।

    राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।।

    एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।

  632. Dohā / Sorṭhā

    2.632

    अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।

    राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।

  633. Caupāī

    2.633

    भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।

    सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।।

    पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।

    तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।

    तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।

    बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।

    भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।

    प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।

  634. Dohā / Sorṭhā

    2.634

    कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।

    अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।

  635. Caupāī

    2.635

    कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।

    नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।

    सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।।

    कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।

    कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।

    महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।

    सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।

    मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।

  636. Dohā / Sorṭhā

    2.636

    सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।

    राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।

  637. Caupāī

    2.637

    एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।

    पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।

    चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।

    सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।

    कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।

    कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।

    देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।।

    फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।

  638. Dohā / Sorṭhā

    2.638

    देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।

    कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।

  639. Caupāī

    2.639

    भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।

    भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।

    गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।

    सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।

    भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।

    करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।

    मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।

    अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।

  640. Dohā / Sorṭhā

    2.640

    जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।

    सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।

  641. Caupāī

    2.641

    पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।

    राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।

    स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।।

    प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।

    अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।

    आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।

    यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।

    भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।

  642. Dohā / Sorṭhā

    2.642

    दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।

    देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।

  643. Caupāī

    2.643

    तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।

    माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।

    मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।

    पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।

    गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।

    अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।।

    देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।

    तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।

  644. Dohā / Sorṭhā

    2.644

    मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।

    पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।

  645. Caupāī

    2.645

    राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।

    बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।

    भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।

    प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।

    चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।

    संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के।।

    कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।।

    भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।

  646. Dohā / Sorṭhā

    2.646

    मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।

    लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।

  647. Caupāī

    2.647

    सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।

    नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।

    रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

    भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।

    तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।

    बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।।

    मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।।

    जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।

  648. Dohā / Sorṭhā

    2.648

    तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।

    भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।

  649. Caupāī

    2.649

    जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।

    बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।

    सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।

    भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।

    सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।।

    सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।

    प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।।

    मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।

  650. Dohā / Sorṭhā

    2.650

    लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।

    चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।

  651. Caupāī

    2.651

    सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।

    देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।

    पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।

    मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।

    सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।

    कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।

    जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।

    नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।

  652. Dohā / Sorṭhā

    2.652

    भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।

    बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।

  653. Caupāī

    2.653

    परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।

    करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।।

    सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।।

    रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।

    बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई।।

    साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।

    हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।।

    बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।।

  654. Dohā / Sorṭhā

    2.654

    गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।

    फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।।

  655. Caupāī

    2.655

    बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।

    कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।

    प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।।

    भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।।

    प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।।

    तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।।

    बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।।

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।

  656. Dohā / Sorṭhā

    2.656

    सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।

    भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।

  657. Caupāī

    2.657

    मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।

    प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।।

    जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।।

    उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

    सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।

    जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।

    सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।

    नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।

  658. Dohā / Sorṭhā

    2.658

    राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।

    तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।

  659. Caupāī

    2.659

    सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।

    पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।

    भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।।

    ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।।

    परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।।

    सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।

    आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।।

    समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।

  660. Dohā / Sorṭhā

    2.660

    सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।

    सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।

  661. Caupāī

    2.661

    राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।

    नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।

    जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।

    असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।

    भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।

    अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।

    तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।

    रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।

  662. Dohā / Sorṭhā

    2.662

    राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।

    चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।

  663. Caupāī

    2.663

    देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।

    नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।

    जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।

    सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।

    ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।

    राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।

    भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।

    बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।

  664. Dohā / Sorṭhā

    2.664

    नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।

    मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।